Saturday, June 19, 2010

आने वाला कल


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कह गया है मुझसे आकर,
आने वाला कल। 
आऊंगा मैं द्वार तुम्हारे ,
होना नहीं विकल। 
जरुरत तुमको मेरी सदा रही है,
बनके तुम्हारा दर्पण मैंने,
तस्वीर  तुम्हारी रची है। 
जो चाहे रंग दे दो इसको,
चाहे मिटादो इसको। 
आत्मबल की पकड़ो कूंची,
छांटो जीवन के रंगों  की सूची। 
रंगों के निर्णायक तुम हो,
तुम सजीव, चित्र भी तुम हो। 
मैं तुम्हारे सम्मुख हूँ,  खाली कोरा पन्ना। 
हाथ तुम्हारे प्रयत्न तुम्हारा, चित्र बनालो अपना॥ 
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अतुल, राधास्वामी !

प्रयास

आस की वैसाखी पकड़,
निराश मन !
एक जतन,
बस एक जतन और,
ओट में मंजिल छुपी है,
हार न, थकहार न,
एक कदम,
बस एक कदम और
खोल ले अपनी पलक,
देख उजाले की झलक,
ले ! थाम ले बांह किरण की,
एक किरण,
बस एक किरण और |
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अतुल, राधास्वामी !

Thursday, June 17, 2010

आधुनिक सभ्यता

एक सभ्य आयाम  और उजड़ गया |
एक  दीन और बिगड़ गया |
कर्म-कर्म  मेरा कर्म, 
बन के  शर्म-शर्म  बिखर गया |
टटोलता रहा स्वंय को, घटना चक्र के बाहर भी ,
शायद,
जलने को बाकी है मेरा बुत अभी भी ,
कि
रोंया- रोंया सिहर  गया |
ढूँढता  रहा दर्पण मिले ,
साथ में हो बिम्ब लिए  ,
देख सकें स्वंय को ,
कि,
चेहरा- मोहरा कैसा उधड़ गया |
कैसे आधुनिक कहूँ ,
कैसे सभ्य मैं रहूँ ,
नव-सभ्यता को थामते ही,
हाथ कंधे से उखड गया |
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अतुल, राधास्वामी !

Wednesday, June 16, 2010

सफलता

बोलते हैं,
खामोश पद- चिन्ह |
सफलता का राज स्वयं |
बताते हैं आपसी होड़ को |
कदम-दर-कदम,
मंजिल की पहुँच को |
राह बना लेते हैं  स्वंय,
स्वरुप दे प्रयास को |
यह सही है,
अनुगामी हैं होते, राह के |
मगर,
राह पर होना, क़दमों का
होना भी,
है सही |
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अतुल, राधास्वामी !

दिशाभ्रम

आदमी,
चंद रोज जीता जगत में,
या,
जिन्दगी चंद रोज की |
है अबूझ उद्देश्य इसका क्या,
 या,
सिर्फ जिन्दा रहने के निमित्त की |
है प्रश्न जब तक जिन्दगी,
आदमी क्यों मौन है |
दुर्लभ है जिज्ञासा दिशा,
या,
दिशाभ्रम है जिन्दगी |
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यह मेरी प्रिय कविता है,
अतुल, राधास्वामी !

Tuesday, June 15, 2010

उड़ान

उड़ जा ओ पंक्षी,
हो उमंगीत- भर उल्लास |
इतना बड़ा है तेरे पास, तेरा आकाश |
न अपने कद को जान भ्रमित हो,
न नाप अपने पंखों की चौड़ाई |
वक्ष उठा ऊपर को ,
उड़ चल ले अंगड़ाई |
देख !
जोहती है तुझको ऊंचाई वह |
तत्क्षण तेरे नीचे होगी धरती यह |
शंकित हो न बैठ यूँ  ही,
नादानी होगी |
उड़ हाँ उड़ ,
तेरी उड़ान "एक कहानी" होगी |
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अतुल, राधास्वामी !

Monday, June 14, 2010

माँ आज क्या पकाएगी (मानसून)

घिरा घनघोर,
वर्षा चहुँ ओर,
बुंदियाँ ये बड़ी-बड़ी,
धरती कि ओर बढ़ी,
पुलकित मन मयूरा,
हंसा गॉंव का छोरा,
चौखट बौछार आई,
देख ये माँ चिल्लाई,
बिटिया क्या भींज रहा,
छप्पर है छींज रहा,
बापू हर्षाये है,
अबके फसल अच्छी आये है,
लगे ज्यों त्यौहार दिवस,
घर-भर में लक-दक,
ख़ुशी गीत गाएगी,
माँ आज क्या पकाएगी ?
(गरम-गरम पकोड़े)
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अतुल, राधास्वामी !

Saturday, June 5, 2010

बेरोजगार

उस अँधेरे गॉंव में,
अँधेरे का सूरज बनकर  वो बिजली का लठ्ठा खड़ा है |
जिसकी रोशनी में एक वो पढ़ कर बढ़ा है |
लठ्ठे कि अब अपनी एक कहानी बन गई है |
चुस्त शरीर, होशियार दिमाग और ईमानदारी
उसकी जवानी बन गई है |
गॉंव से बाहर वह पढ़ने शहर पहुंचा है |
सुविधा के रुमाल से अपनी मेहनत का  पसीना पोंछा है |
डिगरी पाने के बाद नौकरी एक जरुरत बन गई है |
चुस्त शरीर, होशियार दिमाग और ईमानदारी,
अब मुसीबत बन गई है |
डिगरी को शीशे में मढ़वाकर, वह डिगरीदार हो गया है |
मेहनत से सींचा गया पेड़, फल देने से पहले खार हो गया है |
हाँ वह बेकार हो गया है, बेरोजगार हो गया है |
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अतुल, राधास्वामी ! 


 

Wednesday, June 2, 2010

सामर्थ्य की ओर

सब मेट दिया जाता क्षण में, काल ग्रास जब लेता है |
मैं मेट सकूँ यह जगत वासना, मन पुनि-पुनि सोच विचरता है |
धारा बहती वो रीती है, प्रवाह रुका सा भासित है |
मैं ख़म ठोंके हूँ खड़ा मगर आधार अपरिचित लगता है ||
परिचय कैसे हो जीवन से, कैसे माटी सौंधी सी महके |
कब बूंद पड़ेगी इस तृषित धरा पर, सब सूखा-सूखा लगता है ||
मैं चलूँ यहाँ से या रुंकू यहीं पर, मन रोक-रोक देता मुझको |
कदम आवारा रखता हूँ, यह उहा- पोह रहता है ||
तत्क्षण सोचूं जीवन में, जीते-जी क्यों भटकूँ निर्जन में |
आँख मूंद लूँ राहों से, चौराहा भ्रामित करता है ||
क्यों अबूझ-अधूरा लेख करूँ, करूँ फैसला तोड़ कलम दूँ |
हाथ उठाता लिखने को, पर हाथ कांपता लगता है ||
गड़बड़ है सब द्रश्यों की, क्या द्रश्य मेट दूँ आँखों से |
आस किरण बस बाकी ये, पलक-ओट सहारा दिखता है ||
बेकली-बैचेनी बस क्षण-भर है, जीवन को क्षण-क्षण थामे हूँ |
क्षण-क्षण, क्षण दर क्षण जाता है,  क्षण-क्षण,  क्षण-भंगुर लगता है ||
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atul, radhaswami !




Tuesday, May 25, 2010

समय के साथ कदम ताल

एक क्षण को रुको, क्षण नया आएगा |
थाम लो अपनी धड़कन, समय कदम और बढ़ाएगा ||
कान दो !  आहट पर,  चुपचाप निकल जायेगा |
रोक लो !   तुम रास्ता,
फांस लो !   फेंक जाला,
पकड़  सके  !  यह तुम्हें अगला क्षण  बताएगा ||
छोड़ दो !  ख्याल ये, गफलत क्यों हो पालते |
साथ होगा वो तुम्हारे, अगर तुम उसके साथ थे ||
कदम मिलाओ !  उठो अभी,
क्षण भर अगर रुके  तो,
क्षण एक और बीत जायेगा ||
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अतुल, राधास्वामी !

Sunday, May 23, 2010

त्याग

बेटा उसका,
प्रतिष्ठित था, यशस्वी था,
ज्ञानी था, मानी था |
उपलब्धियों के बाज़ार में,
सफलता की कहानी था ||
अब,
उसकी कीर्ति में एक चाँद और जुड़ गया |
चाँद, ये था त्याग का |
त्याग, -------------- ये था बीबी के प्रेम में
मातृत्व का ||
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अतुल,  राधास्वामी !

Friday, May 21, 2010

ये दौर

काल चक्र से बंधे,  बंधे-बंधे जी रहे |
न जानते,  अनायास ही काल त्राण भोग रहे ||
गति खोकर, मति खोकर
भोग की अभिलिप्सा में,  आत्मोउदभव अनुभूति खोकर,
दयापात्र देखो तो, स्वयं विनाश बीज बो रहे ||
अज्ञानता या अनजानना,
बीज बबूल से बबूल ही उपजना,
तात्क्षणिक सुखबोध की उपलब्धि  यह  कैसी ,
प्रकाशपुंज  सूर्य  से तम  अभिवृद्धि  यह कैसी, 
धर्म रहित  प्राण  ये,  मात्र पशुता ढ़ो रहे,
या 
कर्म- फल  के साये  तले, निर्बुद्धि बस बह रहे ||
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अतुल, राधास्वामी !

Friday, April 2, 2010

जन्मदिन पर

कुछ और ही मैं, तलाशता फिर रहा |
देखना है बीता दिन, क्या मैं बिसर रहा ||
तत्व को समझ लूँ, ये तथ्य मुझको चाहियें,
अन्यथा, निरर्थक छन-छन गुजर रहा |
संतुष्टि मुझे क्यों नहीं बीतते पलों से है,
स्व-भान पाने तक क्यों, क्यों धैर्य छय हो रहा ||
बैचेन हूँ मैं, स्व- प्रतिकार से,
क्यों आज, विगत निसार हो रहा ||
क्या बीता साल, यह मुझे बड़ा बनाएगा |
या मेरा प्रवर्तन दिवस, जीवन छोटा कर रहा |
सौंप दे मुझे अस्तित्व मेरा, वक्त
हर छन मैं यही कह रहा ||
उद्धत हूँ , उद्धम को
मगर, दिशाहीन भटकता फिर रहा ||