Friday, April 2, 2010

जन्मदिन पर

कुछ और ही मैं, तलाशता फिर रहा |
देखना है बीता दिन, क्या मैं बिसर रहा ||
तत्व को समझ लूँ, ये तथ्य मुझको चाहियें,
अन्यथा, निरर्थक छन-छन गुजर रहा |
संतुष्टि मुझे क्यों नहीं बीतते पलों से है,
स्व-भान पाने तक क्यों, क्यों धैर्य छय हो रहा ||
बैचेन हूँ मैं, स्व- प्रतिकार से,
क्यों आज, विगत निसार हो रहा ||
क्या बीता साल, यह मुझे बड़ा बनाएगा |
या मेरा प्रवर्तन दिवस, जीवन छोटा कर रहा |
सौंप दे मुझे अस्तित्व मेरा, वक्त
हर छन मैं यही कह रहा ||
उद्धत हूँ , उद्धम को
मगर, दिशाहीन भटकता फिर रहा ||

1 comment:

  1. Radhaswami
    Yah kavita mujhe jyada saral, lagi.....

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